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जब भी देश में किसी बड़े बिल या कानून पर संसद में गरमा-गर्मी होती है, तो आमतौर पर टीवी न्यूज़ पर लोक सभा के हंगामे के दृश्य छाए रहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब लोक सभा में कोई बिल पास हो जाता है, तो देश के नीति-निर्धारकों की असली परीक्षा कहाँ होती है? वह जगह है—राज्य सभा। इसे भारतीय लोकतंत्र का ‘उच्च सदन’ (Upper House) या ‘हॉउस ऑफ एल्डर्स’ (House of Elders) कहा जाता है।
लोक सभा भले ही जनता का सीधा प्रतिनिधित्व करती हो और जहाँ सरकारें बनती व गिरती हैं, लेकिन राज्य सभा देश के संघीय ढांचे की रीढ़ है। यह सदन यह सुनिश्चित करता है कि देश की राजनीति में सिर्फ बहुमत की मनमानी न चले, बल्कि राज्यों के हितों और देश के विद्वानों की आवाज़ भी कानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल हो।
“राज्य सभा केवल एक समीक्षात्मक सदन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संघवाद की वह आत्मा है जो केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखती है।”
आज़ादी के बाद जब भारत का संविधान तैयार किया जा रहा था, तब संविधान निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश को कैसे एक सूत्र में पिरोया जाए। इसके लिए द्विसदनीय विधायिका (Bicameral Legislature) का मॉडल अपनाया गया।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राज्य सभा का गठन किया गया। पहली बार राज्य सभा का गठन 3 अप्रैल 1952 को हुआ था और इसकी पहली बैठक 13 मई 1952 को आयोजित की गई थी। शुरुआत में इसे ‘काउंसिल ऑफ स्टेट्स’ कहा जाता था, लेकिन 23 अगस्त 1954 को इसके सभापति ने सदन में घोषणा की कि अब इसे हिंदी में ‘राज्य सभा’ के नाम से जाना जाएगा।
राज्य सभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है, लेकिन वर्तमान में इसमें 245 सदस्य होते हैं। इन सदस्यों का विभाजन दो मुख्य श्रेणियों में किया गया है:
आइए इसे एक तालिका के माध्यम से आसानी से समझते हैं:
| विवरण | अधिकतम स्वीकृत संख्या | वर्तमान संख्या |
|---|---|---|
| राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्रतिनिधि | 238 | 233 |
| राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य | 12 | 12 |
| कुल योग | 250 | 245 |
अगर आपने कभी राज्य सभा के चुनाव में वोट नहीं दिया, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है—आपने वास्तव में अप्रत्यक्ष रूप से वोट दिया है! राज्य सभा सांसदों का चुनाव आम जनता सीधे नहीं करती, बल्कि जनता द्वारा चुने गए विधायक (MLAs) करते हैं।
राज्य सभा का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation System) के तहत ‘एकल संक्रमणीय मत’ (Single Transferable Vote) द्वारा होता है।
यही कारण है कि जिस पार्टी के पास किसी राज्य की विधानसभा में जितने ज्यादा विधायक होते हैं, उस राज्य से राज्य सभा में उस पार्टी के सांसदों के जीतने की संभावना उतनी ही अधिक होती है।
लोक सभा का कार्यकाल 5 साल का होता है और चुनाव के बाद या प्रधानमंत्री की सलाह पर इसे समय से पहले भी भंग किया जा सकता है। लेकिन राज्य सभा कभी भंग नहीं होती। इसीलिए इसे ‘स्थायी सदन’ (Permanent House) कहा जाता है।
यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि देश में जब भी कोई आपातकाल या राजनीतिक संकट आए, तो संसद का कम से कम एक सदन हमेशा कार्यरत रहे और देश बिना किसी संवैधानिक शून्यता के चलता रहे।
आमतौर पर लोगों को लगता है कि लोक सभा के पास ही सारी ताकत होती है क्योंकि वहां सीधे जनता के प्रतिनिधि होते हैं। लेकिन भारतीय संविधान ने राज्य सभा को कुछ ऐसी अनोखी और एक्सक्लूसिव पावर्स दी हैं जो लोक सभा के पास भी नहीं हैं:
यदि राज्य सभा दो-तिहाई बहुमत से यह प्रस्ताव पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में ‘राज्य सूची’ (State List) के किसी विषय पर संसद को कानून बनाना चाहिए, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है। यह शक्ति केवल राज्य सभा के पास है।
अगर देश में IAS, IPS जैसी कोई नई ऑल इंडिया सर्विस (All-India Services) बनानी हो, तो इसकी शुरुआत केवल राज्य सभा के प्रस्ताव से ही हो सकती है।
भारत के उप-राष्ट्रपति ही राज्य सभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होते हैं। उप-राष्ट्रपति को पद से हटाने का प्रस्ताव केवल और केवल राज्य सभा में ही पेश किया जा सकता है, लोक सभा में नहीं।
संसदीय लोकतंत्र में दोनों सदनों की अपनी-अपनी भूमिका है। हालांकि कुछ मामलों में लोक सभा अधिक शक्तिशाली दिखती है, तो कुछ में दोनों बराबर हैं:
अक्सर राजनीतिक गलियारों में यह बहस छिड़ती है कि जब जनता ने लोक सभा में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दे दिया है, तो राज्य सभा में विधेयकों को रोकना क्या जनता के जनादेश का अपमान है? आलोचक इसे एक ‘डिलेइंग चैंबर’ (देरी करने वाला सदन) कहते हैं।
लेकिन मेरा मानना है कि राज्य सभा की यही ‘रुकावट पैदा करने की क्षमता’ ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ढाल है। सोचिए, अगर लोक सभा में किसी दल को प्रचंड बहुमत मिल जाए, तो वह जल्दबाजी में या राजनीतिक फायदे के लिए कोई भी ऐसा कानून बना सकती है जो देश के संघीय ढांचे या सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाए। राज्य सभा उस जल्दबाज़ी पर एक ब्रेक का काम करती है। यह सरकार को पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करती है।
राज्य सभा केवल राजनेताओं के लिए दूसरी पारी खेलने का स्थान नहीं है, न ही यह लोक सभा की कोई रबड़ स्टैम्प है। यह भारत की विविधता, बौद्धिक क्षमता और राज्यों की स्वायत्तता का प्रतीक है। राज्यों के अधिकारों की रक्षा से लेकर देश के बेहतरीन दिमागों को कानून निर्माण प्रक्रिया में जोड़ने तक—राज्य सभा ने पिछले 7 दशक से भी ज्यादा समय में भारतीय लोकतंत्र को परिपक्व और मजबूत बनाने में ऐतिहासिक योगदान दिया है।
जवाब: भारत के उप-राष्ट्रपति राज्य सभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होते हैं। वर्तमान में जगदीप धनखड़ राज्य सभा के सभापति हैं।
जवाब: राज्य सभा का सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए, जबकि लोक सभा के लिए यह सीमा 25 वर्ष है।
जवाब: नहीं, राज्य सभा एक स्थायी सदन है और इसे कभी भंग नहीं किया जा सकता। इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं।
जवाब: उत्तर प्रदेश की राज्य सभा में सबसे ज्यादा 31 सीटें हैं, क्योंकि सीटों का आवंटन राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है।